एक बड़ा लक्ष्य तय करे और उसे हासिल करने के लिए छोटे-छोटे लक्ष्य बनाएं, एक सपना देखो, किसी सपने के लिए प्रयासरत हुए बिना अपने उज्जवल भविष्य की रचना आपके लिए कदाचित संभव न हो। जो कुछ उपलब्धि चाहते हो सपनों के पीछे पड़ जाना मानव स्वभाव के ताने-बाने में विद्यमान है, क्योंकि आपने अब तक भविष्य के बारे में विचार प्रक्रिया प्रारंभ ही नहीं की है। यदि आप स्वयं को आदर्शविहीन पायें तो अपने खास सपने की खोज करें एवं भविष्य की रचना में जुट जायें। उस सपने को सच बनाने का प्रयास प्रारंभ करना ही आपका अगला कदम है। सर्वप्रथम, यह आवश्यक है कि आपने सपना देख लिया है, किन्तु यह भी सुनिश्चित करना जरूरी है कि आप उसे साकार करने में प्रयासरत हों; सुनने में यह बात ठीक लगती है किन्तु वैसा कर पाना आसान भी नहीं है। ऐसे स्वप्नदृष्टा न बनें जिसे केवल सपनों के सच होने का इंतजार रहता है। सपनों का सच होना उस दिशा में किये गये प्रयास के आकार एवं उसके लिए आपके आग्रह का ही परिणाम है। मैं नहीं चाहता कि कोई भी अपने आदशों के बारे में सपने देखते हुए जीवन-यात्रा करे। अतः लगातार स्वयं से प्रश्न करते रहें "इस सपने को सच क...
जहां तक इंसान में छिपी संभावनाओं को जानने के क्षेत्र की बात है, तो नीज धारणा को बीसवीं सदी की सबसे बड़ी खोज कहा जा सकता है, इसी सोच के मुताबिक हर इंसान जन्म से ही अपने बारे में एक धारणा कायम करता जाता है, फिर आपकी अपने बारे में यही धारणा ही आपके अवचेतन मन के कंप्यूटर को संचालित करने वाला मास्टर प्रोग्राम बन जाती है,
फिर यही तय करती हैं, कि आप क्या सोचेंगे, क्या कहेंगे, महसूस करेंगे, और क्या करेंगे।
यही वजह है कि आपकी जिंदगी में सारा बदलाव खुद के बारे में धारणा बदलने और अपने बारे में अपनी दुनिया के बारे में सोचने का अंदाज बदलते ही दिखाई देने लगता है, वास्तविकता चाहे जो हो जब आप किसी बात को सही मान लेते हैं, तो वही आपके लिए सच बन जाती हैं।
एरिस्टोटल ने लिखा है "जिस किसी भी बात का प्रभाव पड़ता है वही अभिव्यक्ति होती हैं।
अगर आपको ऐसे माता-पिता मिले हैं, जिन्होंने आपको लगातार यह बताया है कि आप कितने अच्छे हैं, जो आपसे प्यार करते थे, आप का समर्थन करते थे, और आप में यकीन करते थे, आपने चाहे जो किया या न किया हो, ऐसे में आप इस विश्वास के साथ बड़े होगे, कि आप एक अच्छे और मूल्यवान व्यक्ति हैं, तीन वर्ष का होने तक यह विश्वास आपमें पैठ कर जाएगा, और दुनिया के साथ आपके रिश्ते का अहम हिस्सा बन जाएगा, उसके बाद, चाहे जो हो जाए, आपका खुद में ये यकीन कायम रहेगा, यही आपके लिए वास्तविकता बन जाएगी।
अगर आपको ऐसे माता-पिता ने बड़ा किया, जो यह नहीं जानते थे कि उनके कहे गए शब्द और उनका व्यवहार आप पर कितना असर डाल सकता है, तो वे आपको नियंत्रित या अनुशासित करने के लिए तीखी आलोचना, असहमति या फिर शारीरिक या मानसिक सजा दे सकते हैं।
जब किसी को बचपन से ही निरंतर आलोचना का सामना करना पड़ता है, तो वह इस निष्कर्ष पर पहुंच जाता है, कि उसमें ही कोई खामी है, उसे यह समझ नहीं आता कि उसे क्यों लगातार आलोचना और सजा का सामना करना पड़ रहा है, उसे यह एहसास भी हो जाता है, कि माता-पिता उसके बारे में सही जानते हैं, और वह इसी काबिल है।
वह यह महसूस करने लगता है, कि उसकी कोई कीमत नहीं है, और न ही वह प्यार पाने के लायक है, उसकी कोई उपयोगिता नहीं है, इसलिए वह बिल्कुल महत्वहीन है।
किशोरावस्था और वयस्कपन में व्यक्तित्व संबंधी जितने भी समस्याएं होती हैं, मनोवैज्ञानिकों की राय में इन सभी की जड़ प्यार की कमी है।
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जब आप अपनी सोच को बदलते हैं तो आप अपनी जिंदगी को भी बदल देते हैं।