एक बड़ा लक्ष्य तय करे और उसे हासिल करने के लिए छोटे-छोटे लक्ष्य बनाएं, एक सपना देखो, किसी सपने के लिए प्रयासरत हुए बिना अपने उज्जवल भविष्य की रचना आपके लिए कदाचित संभव न हो। जो कुछ उपलब्धि चाहते हो सपनों के पीछे पड़ जाना मानव स्वभाव के ताने-बाने में विद्यमान है, क्योंकि आपने अब तक भविष्य के बारे में विचार प्रक्रिया प्रारंभ ही नहीं की है। यदि आप स्वयं को आदर्शविहीन पायें तो अपने खास सपने की खोज करें एवं भविष्य की रचना में जुट जायें। उस सपने को सच बनाने का प्रयास प्रारंभ करना ही आपका अगला कदम है। सर्वप्रथम, यह आवश्यक है कि आपने सपना देख लिया है, किन्तु यह भी सुनिश्चित करना जरूरी है कि आप उसे साकार करने में प्रयासरत हों; सुनने में यह बात ठीक लगती है किन्तु वैसा कर पाना आसान भी नहीं है। ऐसे स्वप्नदृष्टा न बनें जिसे केवल सपनों के सच होने का इंतजार रहता है। सपनों का सच होना उस दिशा में किये गये प्रयास के आकार एवं उसके लिए आपके आग्रह का ही परिणाम है। मैं नहीं चाहता कि कोई भी अपने आदशों के बारे में सपने देखते हुए जीवन-यात्रा करे। अतः लगातार स्वयं से प्रश्न करते रहें "इस सपने को सच क...
जब आपके विश्वास प्रबल होते हैं, तभी वे विश्वास हकीकत में बदलते हैं, हार्वर्ड के डॉक्टर विलियम जेम्स ने 1905 में कहा था, "विश्वास वास्तविक तथ्य का निर्माण करता है।" उन्होंने आगे कहा था, कि "इंसान अपने अंदरूनी नजरिए को बदल कर अपनी जिंदगी के बाहरी पहलुओं को बदल सकता है।"
नेपोलियन हिल ने कहा था, "इंसान का दिमाग जो सोच सकता है, और यकीन कर सकता है, उसे वह हासिल भी कर सकता है।"
आप जिंदगी में जो भी करते या हासिल करते हैं आपका हर विचार, भावना या काम आपकी आत्म अवधारणा से नियंत्रित और निर्धारित होता हैं, आपकी आत्म अवधारणा आपके कार्य प्रदर्शन और प्रभाव के स्तर से पहले आती है, और उसकी भविष्यवाणी करती है, आपकी आत्म अवधारणा आपके मानसिक कंप्यूटर का मास्टर प्रोग्राम है, यह बुनियादी ऑपरेटिंग सिस्टम है, आप बाहरी संसार में जो भी हासिल करते हैं, वह आपकी आत्म अवधारणा का ही परिणाम है।
आपकी आत्म अवधारणा उन सारे विश्वासों, नजरियों, भावनाओं और रायों का महायोग है, जो आपकी अपने और संसार के बारे में होती हैं, इस वजह से आप हमेशा अपनी आत्म अवधारणा के अनुरूप ही काम करते हैं, चाहे वह सकारात्मक हो या नकारात्मक, खुद को सीमित करने वाले विश्वास सबसे बुरे होते हैं।
जब अल्बर्ट आइंस्टीन को सीखने में अक्षम करार देकर बचपन में ही स्कूल से घर भेज दिया गया था, उनके माता-पिता को बताया गया कि यह लड़का शिक्षित हो ही नहीं सकता, माता-पिता ने इस बात को मानने से इंकार कर दिया, और अंततः ऐसी व्यवस्था की, कि आइंस्टीन को उत्कृष्ट शिक्षा मिली।
डॉक्टर अल्बर्ट श्वेटजर को भी स्कूल में यही समस्या आई थी, दरअसल स्कूल वालों ने उनके माता-पिता को प्रोत्साहित किया कि वे उसे किसी मोची का एप्रेंटिस अर्थात चेला बना दे, ताकि बड़े होने पर उसके पास कम से कम एक सुरक्षित काम तो रहे, आइंस्टीन और श्वेटजर, दोनों ही ने बीस साल की उम्र से पहले ही डॉक्टरेट हासिल की, और बीसवीं सदी के इतिहास पर अपने कदमों के निशान छोड़े।
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जब आप अपनी सोच को बदलते हैं तो आप अपनी जिंदगी को भी बदल देते हैं।